*कुमराम भीम* "मावा नाटे मावा राज..."(Great freedom fighter)
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कुमराम भीम यानी भीमराव कुमरे। ये नाम तेलंगाना क्षेत्र में केवल आदिवासी ही नही, बहुत लोग ईस नाम से परिचित है..आदिवासी समाज इन्हें अपनें भाग्य देवता के रूप में मानते है...एक छोटे से ग्राम जोडे़नघाट तहसील व जिला आसिफाबाद (तेलगांना)के आदिवासी गोंड समाज में दि.२२-अक्टूबर १९०१ को जन्मे कुमराम भीम (भीमराव कुमरे)बाल्यपन से ही सामाजिक प्रेम और स्वतंत्र रहनसहन के प्रेमी थे..दुसरों के अधीन मे रहना उन्हें पसंस नही था।
उस समय अंधविश्वास ज्यादा होने के कारण आदिवासी लोग एक जगह नही ठहरते थे। प्राय :4-5 वर्ष में ही अपना निवासस्थान बदलते तथा अन्य जगह जंगल काटकर अपना निवासस्थान बनाते थे।जिस वजह से वन अधिकारीयों द्वारा उन्हें हमेशा परेशान किया जाता था।कभी-कभी उन्हें जेल में भी जाना पड़था था।उस समय निजाम का शासन था।ग्राम पटेल से लेकर जिला अधिकारी तक अय्या-मिय्या अर्थात ब्राम्हण और मुसलमान का ही बोलबाला था। शासन प्रशासन से गांव शहर तक अय्या -मिय्या ही समाज मे अच्छे बुरे का निर्णय करते थे।
शासकीय अधिकारी लगान वसूल करनें आते तब गरीब आदिवासी मजबुरी में लगान न देनेपर उन्हें घोड़े की चाबूक से पिटतें और उनके बहु -बेटीयों से भी छेडछाड़ करते थे।कुमराम भीम युवा होने पर इस प्रकार के असामाजिक कृत्यों के खिलाफ़ लोगों मे जागरूकता उत्पन्न करने लगा।समाज की महिलाऒ के साथ अय्या मिय्या के द्वारा अश्लील हरकतों से कुमराम भीम ने विरोध करना शुरु किया और तत्कालीन निजाम शासक के खिलाफ विद्रोह करनें की योजना बनाई।
जल -जंगल -जमीन यह नैसर्गिक है और यह नैसर्गिक आदिवासीयों का हक है।इस पर अन्य का अधिकार नही होना चाहिऐ,इसी के साथ कुमराम भीम ने जोडेनघाट क्षेत्र मे युवा आदिवासीयों की एक टीम बनाया और उन्हें बाण चलाना सिखाने लगा।जहां पर भी आदिवासीयों पर अन्याय होता। वहां भीम जाकर अन्याय के विरोध में लड़ता।आदिवासी समाज की परिस्थिती को देखने के लिऎ कुमराम स्वय महाराष्ट्र -मध्यप्रदेश इत्यादी क्षेत्रों का दौरा करने लगा।जोडेनघाट यह ग्राम पहाड़ पर है और उसके निचले भाग में बाबेझरी नाम का ग्राम है,यह आसिफाबाद जिला स्थान से १५-२० किलोमीटर की दुरी में है..कुमराम भीम आदिवासियों के लिऎ आकाश के तारा के रुप में था। वह गोंड समाज मे क्रान्ती का बीज बो रहां था।क्रान्तिकारी भगतसिंह को वह अपना आदर्श मानता था। कुमराम भीम २० वी सदी के शुरुवात का एक ऐसा व्यक्ती था। जिसने समाज के लिऐ अपना सर्वस्व लुटा दिया और समाज के सामने खडा़ होकर शासक निजाम कों ललकारा। उसे उखाड़ फेकनें की ताकद रकता था।जल-जमी-जंगल पर अधिकार चाहता था.। मावा नाटे मावा राज " (अपने गांव मे अपनी सत्ता)उनका सिद्धांन्त- था।आखीर निजाम सरकार ने उनसे समझौता करने आसिफाबाद तहसील के तालुकादार अब्दुल सत्तार को उनके पास भेजा।
लेकिन भीम ने जल-जमी-जंगल के सीवा अन्य विकास पर वार्तालाप करने को कहा।अत:उनसे समझौता नही हो सका तब तहसीलदार ने कुमराम पर क्रोधीत होकर बन्दी बनाना चाहा और कहा की मै निजाम राजा का अधिकारी हूँ,तुम्हे बन्दी बनाकर ले जा सकता हूँ,तुम्हे कड़े से कडा़ दंड दे सकता हूँ। यह सुनकर भीम के साथीयों ने उनपर हमला कर दिया और कहां कि "मावा नाटे मावा राज"(हमारे गांव मे हमारा राज) निजाम राजा कों हम नही मानते।अंतत: तहसीलदार को वापस जाना पडा़ और इसके कुछ़ दिनों पश्चात तहसीलदार अब्दुल सत्तार सौ से जादा फौज लेकर जोडे़नघाट पर भीम को गिरफ्तार करने के लिऎ आ पहुचा। जैसे ही निजाम के सैनिको के आगमन की सुचना भीम और उनके साथीयों को मिली, उन्होंने पहाड़ के उपर से सैनिकों पर तीर व पत्थरों से हमला बोल दिया।भीम के साथ आदिवासी महिलाओं ने भी इसमें भाग लिया।दोनों ओर से युद्ध बहुत दिनों तक चला।भीम के साथी कुमरा मानकु, रौट कोंडाल, कुमरे भीम,सिडाम भीम,सिडाम राजु, अलाम भीम,कोवा अरजू, मडावी मोहपाराव,चहकारी बार्दी,आत्राम भीम,कोमराम रघू,नेताम गंगू,पुरका मानकू, आत्राम सगू,अरका रघू, इत्यादी सभी साथी मारे गये। और १० लोग घायल हो गये।आखीर निजाम सेना अधिकारी ने जाल रचा और बाबेझरी के भीम के विश्वसनीय साथी को लालच दिखाकर भीम के शक्ती का राज मालूम किया।और दशहरा के पुर्णिमा के दिन उसी रात को ८ अक्टुंबर १९४० को पूर्ण चंद्र ग्रहन के समय कुमराम भीम और उनके साथीयों पर चारों ओर से हमला बोल दिया।रात्री में हुये अचानक हमलें सें कुमराम भीम एवं उसके साथी घिरा गये। और १५-२० सिपाहियों ने घेरकर तलवार से एक ही वार मे कुमराम भीम की गर्दन काट दी।
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कुमराम भीम यानी भीमराव कुमरे। ये नाम तेलंगाना क्षेत्र में केवल आदिवासी ही नही, बहुत लोग ईस नाम से परिचित है..आदिवासी समाज इन्हें अपनें भाग्य देवता के रूप में मानते है...एक छोटे से ग्राम जोडे़नघाट तहसील व जिला आसिफाबाद (तेलगांना)के आदिवासी गोंड समाज में दि.२२-अक्टूबर १९०१ को जन्मे कुमराम भीम (भीमराव कुमरे)बाल्यपन से ही सामाजिक प्रेम और स्वतंत्र रहनसहन के प्रेमी थे..दुसरों के अधीन मे रहना उन्हें पसंस नही था।
उस समय अंधविश्वास ज्यादा होने के कारण आदिवासी लोग एक जगह नही ठहरते थे। प्राय :4-5 वर्ष में ही अपना निवासस्थान बदलते तथा अन्य जगह जंगल काटकर अपना निवासस्थान बनाते थे।जिस वजह से वन अधिकारीयों द्वारा उन्हें हमेशा परेशान किया जाता था।कभी-कभी उन्हें जेल में भी जाना पड़था था।उस समय निजाम का शासन था।ग्राम पटेल से लेकर जिला अधिकारी तक अय्या-मिय्या अर्थात ब्राम्हण और मुसलमान का ही बोलबाला था। शासन प्रशासन से गांव शहर तक अय्या -मिय्या ही समाज मे अच्छे बुरे का निर्णय करते थे।
शासकीय अधिकारी लगान वसूल करनें आते तब गरीब आदिवासी मजबुरी में लगान न देनेपर उन्हें घोड़े की चाबूक से पिटतें और उनके बहु -बेटीयों से भी छेडछाड़ करते थे।कुमराम भीम युवा होने पर इस प्रकार के असामाजिक कृत्यों के खिलाफ़ लोगों मे जागरूकता उत्पन्न करने लगा।समाज की महिलाऒ के साथ अय्या मिय्या के द्वारा अश्लील हरकतों से कुमराम भीम ने विरोध करना शुरु किया और तत्कालीन निजाम शासक के खिलाफ विद्रोह करनें की योजना बनाई।
जल -जंगल -जमीन यह नैसर्गिक है और यह नैसर्गिक आदिवासीयों का हक है।इस पर अन्य का अधिकार नही होना चाहिऐ,इसी के साथ कुमराम भीम ने जोडेनघाट क्षेत्र मे युवा आदिवासीयों की एक टीम बनाया और उन्हें बाण चलाना सिखाने लगा।जहां पर भी आदिवासीयों पर अन्याय होता। वहां भीम जाकर अन्याय के विरोध में लड़ता।आदिवासी समाज की परिस्थिती को देखने के लिऎ कुमराम स्वय महाराष्ट्र -मध्यप्रदेश इत्यादी क्षेत्रों का दौरा करने लगा।जोडेनघाट यह ग्राम पहाड़ पर है और उसके निचले भाग में बाबेझरी नाम का ग्राम है,यह आसिफाबाद जिला स्थान से १५-२० किलोमीटर की दुरी में है..कुमराम भीम आदिवासियों के लिऎ आकाश के तारा के रुप में था। वह गोंड समाज मे क्रान्ती का बीज बो रहां था।क्रान्तिकारी भगतसिंह को वह अपना आदर्श मानता था। कुमराम भीम २० वी सदी के शुरुवात का एक ऐसा व्यक्ती था। जिसने समाज के लिऐ अपना सर्वस्व लुटा दिया और समाज के सामने खडा़ होकर शासक निजाम कों ललकारा। उसे उखाड़ फेकनें की ताकद रकता था।जल-जमी-जंगल पर अधिकार चाहता था.। मावा नाटे मावा राज " (अपने गांव मे अपनी सत्ता)उनका सिद्धांन्त- था।आखीर निजाम सरकार ने उनसे समझौता करने आसिफाबाद तहसील के तालुकादार अब्दुल सत्तार को उनके पास भेजा।
लेकिन भीम ने जल-जमी-जंगल के सीवा अन्य विकास पर वार्तालाप करने को कहा।अत:उनसे समझौता नही हो सका तब तहसीलदार ने कुमराम पर क्रोधीत होकर बन्दी बनाना चाहा और कहा की मै निजाम राजा का अधिकारी हूँ,तुम्हे बन्दी बनाकर ले जा सकता हूँ,तुम्हे कड़े से कडा़ दंड दे सकता हूँ। यह सुनकर भीम के साथीयों ने उनपर हमला कर दिया और कहां कि "मावा नाटे मावा राज"(हमारे गांव मे हमारा राज) निजाम राजा कों हम नही मानते।अंतत: तहसीलदार को वापस जाना पडा़ और इसके कुछ़ दिनों पश्चात तहसीलदार अब्दुल सत्तार सौ से जादा फौज लेकर जोडे़नघाट पर भीम को गिरफ्तार करने के लिऎ आ पहुचा। जैसे ही निजाम के सैनिको के आगमन की सुचना भीम और उनके साथीयों को मिली, उन्होंने पहाड़ के उपर से सैनिकों पर तीर व पत्थरों से हमला बोल दिया।भीम के साथ आदिवासी महिलाओं ने भी इसमें भाग लिया।दोनों ओर से युद्ध बहुत दिनों तक चला।भीम के साथी कुमरा मानकु, रौट कोंडाल, कुमरे भीम,सिडाम भीम,सिडाम राजु, अलाम भीम,कोवा अरजू, मडावी मोहपाराव,चहकारी बार्दी,आत्राम भीम,कोमराम रघू,नेताम गंगू,पुरका मानकू, आत्राम सगू,अरका रघू, इत्यादी सभी साथी मारे गये। और १० लोग घायल हो गये।आखीर निजाम सेना अधिकारी ने जाल रचा और बाबेझरी के भीम के विश्वसनीय साथी को लालच दिखाकर भीम के शक्ती का राज मालूम किया।और दशहरा के पुर्णिमा के दिन उसी रात को ८ अक्टुंबर १९४० को पूर्ण चंद्र ग्रहन के समय कुमराम भीम और उनके साथीयों पर चारों ओर से हमला बोल दिया।रात्री में हुये अचानक हमलें सें कुमराम भीम एवं उसके साथी घिरा गये। और १५-२० सिपाहियों ने घेरकर तलवार से एक ही वार मे कुमराम भीम की गर्दन काट दी।
ईस प्रकार आदिवासीयों का वीर पुरूष समाज के लिऎ लड़ते लड़ते वीरगती को प्राप्त हुवाॅ.।तब से आदिवासीयों के लिऎ कोई वीर पुरुष आगे नही आ रहा है।आदिवासी समाज के सैकडो़ लोग अधिकारी के पद में है।या राजनीती पद पर है।लेकीन ये लोग समाज के विषय पर नही सोचते।शहिद कुमराम भीम की स्मृती मे अक्टूंबर माहीत के दशहरा पुर्णिमा के अवसर पर उनकी पुण्यतिथी मनायी जाती है(death Anniversary) यह स्मृति तेलगांना शासन की ओर से मनायी जाती है।उस दिन जोडे़नघाट मे कार्यक्रम आयोजित कर आदिवासीयों का दरबार लगाया जाता है।हाल में नवनिर्मित तेलगांना प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री.के चंद्रशेखर राव ने गत १०-२०१४ मे जोडे़घाट आकर कुमराम भीम के नाम पर यहां एक "ट़्रायबल म्युझियम " तथा जोडेनघाट ग्राम विकास हेतू आदिवासी सब प्लांक (tribal sub-plan) से रुपये २५ करोड और प्रोजेक्ट हेतू ९ एकर जमीन देने का वायदा किया था।शहिद वीर कुमराम भीम एवं साथीयों की शहादत को प्रकाश मे काने हेतू श्री.सिडाम अर्जु मास्टर जी ने बहुत मेहनत की है।उनके ही प्रयत्नों से आज नव निर्मित आसिफाबाद जिले का नाम बदलकर श्री.कुमराम भीम नाम रखा गया..ईस गोंन्डवाना वीर सपुत को मेरा शत-शत- सलाम नमन..जय सेवा...
साभार-
आदिवासी सत्ता..(सामाजिक पत्रिका)
संकलन -अशोक आडे
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Thank you So Much for your Useful Suggestion..!!